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हर माता-पिता कि इच्छा होती है कि उनके बच्‍चे बेस्ट स्‍कूल में पढ़ाई करें। आजकल पढाई में कॉम्‍पिटीशन इतना बढ़ गया है कि कौन सा स्कूल आपके बच्‍चे के लिए सबसे बेहतर है, यह तय करना भी मुश्किल हो जाता है। इतना ही नहीं हमारे देश में तो कुछ स्कूल इतने महंगे हैं कि आम लोगों के लिए इन स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाना नामुमकिन है। हालांकि यहां पर हर सुविधा का बखूबी ख्याल रखा जाता है और इसी कारण इन स्कूलों का नाम टॉप स्कूलों में लिया जाता है। इन स्कूलों की फीस इतनी है कि आप सुनते ही हैरान हो जाएंगे। आइए बताते हैं भारत के सबसे महंगे स्कूलों के बारे में।
दून स्‍कूल (Doon School, Dehradun) – 
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यह भारत के टॉप स्‍कूलों में शुमार है। इस स्‍कूल को दून वैली में 1929 में खोला गया था। यह स्कूल सिर्फ लड़कों के लिए है। यहां से देश के कुछ अमीर घरानों के बच्‍चों ने पढ़ाई की है। राहुल गांधी, राजीव गांधी, हीरो ग्रुप के सुनील मुंजाल और पवन मुंजाल इसमें शामिल हैं।
फीस – इस स्‍कूल की फीस 9.7 लाख रुपए सालाना है। 25 हजार टर्म फीस है। एडमिशन के समय यहां पर 3,50,000 रुपए सिक्‍युरिटी के तौर पर जमा कराने होते हैं, जो रिफंडेबल होता है। वनटाइम एडमिशन फीस 3.5 लाख रुपए देनी होती है।
सिंधिया स्‍कूल (Scindia School, Gwalior)-
सिंधिया स्कूल को 1897 में ग्वालियर में खोला गया था। इस स्‍कूल को तब के महाराज माधव राव सिंधिया ने खोला था। यहां से बॉलीवुड के कई सितारों ने पढ़ाई की है। उनमें से सलमान खान और अनुराग कश्यप प्रमुख हैं। इसके अलावा रिलायंस इंडस्‍ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी ने भी इसी स्‍कूल से पढ़ाई की है।
फीस – सिंधिया स्कूल की सालाना फीस करीब 7,70,800 रुपए है।



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मायो कॉलेज (Mayo College, Ajmer) –
यह राजस्थान के अजमेर में है। यह ब्यॉयज रेसिडेंशियल पब्लिक स्‍कूल है, जिसे 1875 में बनाया गया था। यह भारत के सबसे पुराने बोर्डिंग स्‍कूलों में से एक है। यहां 9 होल गोल्‍फ कोर्स और पोलो ग्राउंड हैं।
फीस – यहां की सालाना फीस लगभग 5.14 लाख रुपए है।
इकोल मोंडिएल वर्ल्ड स्कूल (École Mondiale World School, Mumbai) –
यह स्कूल IB प्राइमरी ईयर्स प्रोग्राम, मिडल ईयर्स प्रोग्राम और डिप्‍लोमा प्रोग्राम के लिए है। ये ग्रेड 9 और 10 के लिए IGCSE भी ऑफर करता है।
फीस – यहां की सालाना फीस करीब 10.9 लाख रुपए है।
वेलहम ब्यॉयज स्कूल (Welham Boys’ School, Dehradun) –
यह 30 एकड़ में फैला स्कूल है, जो दून वैली स्कूल के पास ही है। यहां से कई बड़े नेताओं ने पढ़ाई की है। उनमें से पूर्व केंद्रीय मंत्री मणि शंकर अय्यर, ओडि़शा के सीएम नवीन पटनायक पंजाब के सीएम कैप्‍टन अ‍मरिंदर सिंह और विक्रम सेठ जैसे दिग्‍गजों ने पढ़ाई की है। यहीं से वरुण गांधी के पिता संजय गांधी ने भी पढ़ाई की थी।
फीस – यहां की सालाना फीस लगभग 5.7 लाख रुपए है। उस अवधि के दौरान ट्यूशन समेत अन्‍य फैसिलिटी के लिए अतिरिक्त 1लाख रुपए देने पड़ते हैं।
वुडस्टॉक स्कूल (Woodstock School, Mussoorie) –
यह एक को-एड बोर्डिंग सकूल है। यह स्कूल मसूरी में हैं। यहां से एक्‍टर टॉम अल्‍टर और राइटर नयनतारा सहगल ने पढ़ाई की है।
फीस – सालाना फीस लगभग 15.9 लाख रुपए है। यहां पर एडमिशन के समय 4 लाख रुपए देने होते हैं, जो नॉन-रिफंडेबल फीस होती है।
गुड शेफर्ड स्कूल (Good Shepherd School, Ooty) –


ऊटी का यह एक फुल टाइम रेजिडेंशियल स्कूल है। नीलगिरि पहाड़ी पट्टी में स्थित इस स्कूल का कैंपस 70 एकड़ में फैला है।
फीस – 10 लाख रुपए तक (सालाना) ।

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जाने बाबा साहेब, "डॉ. भीमराव अंबेडकर" के जीवन के बारे कई ऐसे अनछुए पहलू 
संविधान निर्मात्री सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष रहे डॉ. भीमराव अंबेडकर के जीवन के बारे कई ऐसे अनछुए पहलू हैं जिसके बारे में लोगों को कम ही जानकारी है.
आज हम आपको उनके जीवन से संबंधित ऐसी कुछ अनकही बातें बताएंगे.
भीमराव अंबेडकर का जन्मदिन 14 अप्रैल ,1891 को हुआ था. उनके पिता का नाम रामजीलाल सकपाल और माता का नाम भीमाबाई था. दलित समाज और गरीब परिवार में जन्म लेने के कारण उनका आरम्भिक जीवन बहुत ही कठिनाईयों में बीता.
बचपन में ही उनको सामाजिक असमानता का ऐसा दंश झेलना पड़ा, जिसकी की हम आज कल्पना नहीं कर सकते हैं.
डॉ. अंबेडकर जब स्कूल में पढ़ने के लिए गए तो वही से उनके साथ सामाजिक भेदभाव की शुरूआत हो गई थी. स्कूल में अच्छी पढाई करने के बावजूद भी बाबा साहेब को कई प्रकार के भेदभाव का सामना करना पड़ता.
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"जाने बाबा साहेब, "डॉ. भीमराव अंबेडकर" के जीवन के बारे कई ऐसे अनछुए पहलू "
आपको जानकर ताज्जुब होगा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर को कक्षा के अंदर बैठने की इज्जत नहीं थी. अर्थात वे कक्षा के बाहर रहकर ही पढ़ सकते थे. सोचो ये कितना बड़ा अत्याचार रहा होगा.
इतना ही नहीं जब उनको प्यास लगती तो वह किसी ऊंची जाति के शख्स के पानी को पीना तो दूर हाथ भी नहीं लगा सकते थे क्योंकि ऐसा करने की उन्हे इज्जात नहीं थी.
जब वे इस सामाजिक दंश को झेल रहे थे तो उस वक्त उनकी मदद के लिए आगे आए उनके ही एक शिक्षक. ये शिक्षक उनकी जाति के न होकर ब्राह्मण थे.
बाबा साहेब के इस इन गुरू को उनसे बहुत लगाव था. जिसके चलते ही उन्होंने अपना सरनेम उनको दे दिया. ताकि इसके चलते उन्हें अपनी आगे की पढ़ाई में कोई परेशानी नहीं आए. बाबा साहेब ने भी अपने नाम के साथ लगा सकपाल टाइटल हटाकर अंबेडकर जोड़ लिया.
यही नहीं, डॉ. अंबेडकर की शादी पूरे हिंदू रिति रिवाज के साथ नौ साल की लड़की रमाबाई से हुआ था और उनकी पहली औलाद बेटे यशवंत थे. डॉ.अंबेडकर ने जो दूसरी शादी की थी वह एक ब्राह्मण महिला से की थी.
बहराल, इसके बावजूद भी उनके साथ जातीय भेदभाव ने पीछा नहीं छोड़ा. इसी दंश झेलते झेलते डॉ. अंबेडकर के भीतर न केवल सामाजिक बुराईयों से लड़ने की ताकत आई बल्कि समाज में परिवर्तन कैसे लाया जाए इसको लेकर भी उनके मन में परिकल्पना आई.
आपको बता दें उनकी परिक्लपना थी कि सभी लोग समान हो और किसी भी तरह का ऊंच – नीचे न हो.
इसके अलावा बाबा साहेब जिस जाति से आते हैं वह महार जाति है. यह एक लड़ाकू कौम है. भारतीय सेना में आज से नहीं बल्कि अंग्रेजों के समय से महार रेजीमेंट है.
आपको बता दें कि डॉ. अंबेडकर के पूर्वजों ने काफी लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में सेना के तौर पर काम किया था. उनके पिता भारतीय सेना की मऊ छावनी में सूबेदार की पोस्ट पर थे.
इसके अलावा डॉ. भीमराव अंबेडकर के जन्म को लेकर भी कई लोगों को जानकारी नहीं है कि उनका मध्यप्रदेश के मऊ में हुआ था. बहुत से लोग महाराष्ट्र में किसी स्थान को उनका जन्म स्थान मानते है.
जबकि कुछ लोग तो मऊ को लेकर भी गलतफहमी में पड़ जाते हैं. वे भीमराव अंबेडकर के जन्म स्थान मऊ को उत्तर प्रदेश वाला मऊ समझकर यूपी में उनका जन्म स्थान मानते हैं.

थक हार के ना रुकना ऐ मंज़िल के मुसाफ़िर,
मंज़िल भी मिलेगी, मिलने का मज़ा भी आएगा.
दुनिया के हर सफ़ल व्यक्ति को देखने के बाद आम आदमी के मन में उनके जैसा बनने की चाहत जाग उठती है. अकसर हम यही सोचते रहते हैं कि यार ये बड़े लोग ऐसा क्या करते हैं, जो सफ़लता इनके कदम चूम रही है. अगर आपके मन में भी कुछ ऐसे ही सवाल चल रहे हैं और आप भी इन लोगों की तरह सफ़ल होकर नाम कमाना चाहते हैं, तो सबसे पहले ये जान लीजिए कि सफ़लता का कोई Short Cut नहीं होता है.
शौहरत और दौलत पाना इतना आसान काम नहीं, जितना हम सब सोचते हैं. बिल गेट्स से लेकर मुकेश अंबानी तक, इन लोगों को सफ़लता रातों-रात नहीं मिली, बल्कि इन कुछ ख़ास आदतों की वजह ये लोग देश-दुनिया में अपनी सफ़लता का परचम लहराने में कामयाब रहे. आइए जानते हैं कि इनमें ऐसी क्या ख़ास बात है, जिसके कारण ये लोग दुनिया के सफ़ल व्यक्तियों में से एक हैं.

1. पढ़ना, पढ़ना और पढ़ना


2. सुबह जल्दी उठना और रात तक काम करना


3. रिस्क लेने की आदत



4. भाषा


5. निर्णय क्षमता


6. ज़िंदगी जीने का अंदाज़



7. जीवन शैली


8. सफ़लता उम्र की मोहताज नहीं होती


9. खुद को करें मोटिवेट



10. काम से प्यार होना





source:gp

कहते हैं कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं. ऐसा ही कर दिखाया है 12th में पढ़ने वाले हर्षित शर्मा ने. गूगल में हर्षित को इंटरशिप मिली है और वहां इंटर्नशिप करने के लिए उसे 4 लाख रुपये महीने की सैलरी मिलेगी.
 dainikkhabar
हर्षित, चंडीगढ़ के सेक्टर 33 के Model Senior Secondary School में पढ़ता है. उसे ग्राफ़िक्स में खासी दिलचस्पी थी. अपने काम को उसने गूगल की साइट पर डाला और उनसे इंटर्नशिप देने के लिए आग्रह किया.









Source: Indian Express

गूगल को हर्षित का काम काफ़ी पसंद आया और कंपनी ने उसे पहले इंटर्नशिप देने की बात कही और फिर इसके खत्म होने के बाद उसे 12 लाख हर महीने पर जॉब तक ऑफ़र कर दी है.


एक निजी पेपर से बात करते हुए हर्षित ने बताया कि 'ये जॉब किसी सपने जैसी है. मुझे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा कि मुझे ये जॉब ऑफ़र हुई है. मेरे जैसे आम लड़को को ऐसी जॉब मिल सकती है.'

हर्षित की स्कूल प्रिंसिपल भी उस पर काफ़ी गर्व महसूस कर रही है. उनका कहना है कि 'हर्षित हमेशा से ही कुछ अलग सोचता था. उसका दिमाग काफ़ी क्रिएटिव था. हर्षित को मिले गूगल के इस ऑफ़र ने हमारे स्कूल और शहर का नाम दोनों रोशन किया है.'

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हर्षित जैसे बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं और उनकी तरक्की देख कर लगता है कि देश सही हाथों में जाने वाला है. हम सब को हर्षित पर गर्व है.


Source: Indianexpress





बाप है 6000 करोड़ रुपए का मालिक ‘हीरा व्यापारी’ और बेटा कर रहा है 4000 रुपए की नौकरी..
एक पिता की जिम्मेदारी होती है की वो अपनी संतान को हर परेशानी का मुकाबला करना और हर परिस्थिति को संभालने की क्षमता के गुण सिखाये। ऐसी ही एक मिसाल पेश की है गुजरात के मशहूर बिसनेसमेन सावजी ढोलकिया ने, जो एक बड़े हीरा व्यापारी है। पिछले साल दिवाली पर अपने कर्मचारियों को कार और घर का बोनस देकर सावजी ढोलकिया ने खूब चर्चा बटोरी थी पर क्या आप जानते है इस मशहूर बिसनेसमैन का बेटा मात्र 4000 रूपए की नौकरी करता है।
आपको ये जानकार बड़ी हैरानी होगी जी जिस इंसान का 6000 करोड़ का कारोबार हो और उसका बेटा 4000 की नौकरी क्यों कर रहा है। लेकिन इसके पीछे जो कारण है वो वाकई प्रेरणा देने लायक है। सावजी ढोलकिया के बेटे द्रव्य ढोलकिया की उम्र 21 वर्ष है और उन्हें सावजी ने मात्र 7000 रूपए देकर घर से बाहर भेज दिया जिससे वो अपने पैरों पर खड़े हो सके और सीख सके की उनके पिता ने एक आम आदमी से उठकर इतना बड़ा व्यापर कैसे खड़ा किया।
सावजी चाहते है की उनका बेटा भी दुनिया को समझे और एक आम इंसान को होने परेशानियों से अवगत हो। साथ ही अपने बेटे को सख्त हिदायत भी दी कि वो किसी को उनकी पहचान न बताएं, जिससे कि उनके बेटे को उनके नाम का फायदा मिल सके।द्रव्य बताते है पहले उन्हें ये फैसला काफी बुरा लगा और घर से निकलने के बाद उन्हें काफी मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा।
साथ ही उनके पिता ने उनके सामने तीन शर्ते भी रखी थी की न तो वो किसी के सामने अपनी पहचान उजागर करेंगे जिससे उन्हें अपने नाम का फायदा मिल सके ,दूसरा किसी भी जगह वो एक सप्ताह से ज्यादा काम नहीं करेंगे और तीसरी शर्त की दिए गए 7000 रूपए का इस्तेमाल वो सिर्फ आपातकाल की स्थिति में ही कर सकते है।
इन सब शर्तों का पालन करते हुए उन्होंने समझा की उनके पिता उन्हें जीवन का कितना बड़ा सबक सीखना चाहते है। इसके बाद द्रव्य ने कॉल सेंटर, बेकरी, जूतों की दुकान, मैकडॉनल्ड आदि जगहों पर नौकरी की। और इस सबक में द्रव्य ने सीखा की ये चीज़ें किसी स्कूल और कॉलेज में वो कभी नहीं सीख सकते थे जो उनके पिता ने सिखाई है।



Image result for भारतीय मूल के अर्पण बने ब्रिटेन के सबसे युवा डॉक्टर, तोड़ा रिकॉर्ड


भारतीय मूल के डॉक्टर को ब्रिटेन में सबसे युवा चिकित्सक बनने का गौरव प्राप्त हुआ। यूनिवर्सिटी ऑफ शेफिल्ड से मेडिसिन और सर्जरी में स्नातक कर चुके अर्पण डोषी ब्रिटेन में सबसे कम उम्र में चिकित्सा सेवा देने वाले डॉक्टर बन गए हैं। 

उन्हें उत्तर-पूर्व इंग्लैंड के एक अस्पताल में बतौर चिकित्सक सेवा शुरू करने का मौका मिला है।

अर्पण की उम्र 21 वर्ष और 335 दिन है और वह अगले महीने यॉर्क में जूनियर डॉक्टर के रूप में सेवा देना शुरू करेंगे। उन्होंने सबसे युवा डॉक्टर बनने का रिकॉर्ड महज 17 दिनों से तोड़ा है। पिछला रिकॉर्ड रशेल फाय हिल के नाम था, जिन्होंने 2010 में महज 21 वर्ष और 352 दिन में चिकित्सा सेवा शुरू की थी। रशेल मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी से चिकित्सा में स्नातक है।  

अर्पण गुजरात के गांधीनगर के रहने वाले हैं और 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने यहां के एक स्थानीय स्कूल में पढ़ाई की थी। उसके पिता भरत एक मेकेनिकल इंजीनियर हैं और इंटरनेशनल फ्यूजन प्रोजेक्ट के हिस्से के तौर पर एक्सि एन प्रांत में जॉब मिलने के बाद उनका पूरा परिवार फ्रांस में बस गया था। 
अर्पण अंग्रेजी, हिंदी और गुजराती धाराप्रवाह बोलते हैं। 
अर्पण अगस्त में यॉर्क टीचिंग अस्पताल में जूनियर डॉक्टर के रूप में दो साल की प्रशिक्षण शुरू कर रहे हैं। 

'आपके घर लड़की हुई है' ये शब्द सुनते ही, कई लोगों का मुंह बन जाता है. ऐसे लोग शायद ये भूल जाते हैं कि आज कल की छोरियां, किसी छोरे से कम नहीं होती. इसका जीता जागता उदाहरण हैं गुजरात कि ये चार बहनें. इन चार बहनों ने गुजरात के साथ-साथ देश का भी नाम रोशन किया है. दरअसल, 
कोडिनार तहसील के छोटे से गांव सरखड़ी के किसान मेरामण भाई वाला की बेटी चेतना वाला ने चीन में आयोजित हुए, ब्रिक्स टूर्नामेंट में भारतीय टीम का नेतृत्व कर देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है. 19 साल की चेतना ने बीते 21 जून को चीन में भारतीय अंडर-20 महिला वॉलीबॉल टीम का नेतृत्व किया.
7 स्वर्ण, 7 रजत, 12 कांस्य और 24 राष्ट्रीय पुरस्कार भी हासिल करने वाली, चारों वाला बहनें न सिर्फ़ वॉलीबाल खेलती हैं, बल्कि खेती के काम में भी अपने पिता की बराबर मदद करती हैं. 
चेतना और किंजल भारतीय जूनियर महिला टीम की केप्टन भी रह चुकी हैं. चार में से दो बहनें इंटरनेशनल और दो नेशनल टूर्नामेंट खेल कर, अपनी सफ़लता का परचंप लहरा चुकी हैं.


Image Source : bhaskar
बातचीत के दौरान चेतना ने बताया, 'मुझे अपनी बहन किंजल से बहुत कुछ सीखने को मिला और मैं आज जहां भी हूं सिर्फ़ अपने पिता की वजह से हूं.'
अपनी मेहनत के दम पर इतना कुछ हासिल करने वाली, इन बहनों की जितनी तारीफ़ की जाए, उतनी कम है. 
Source : timesofindia

कई ख़बरें ऐसी होती हैं, जिन्हें पढ़ने या सुनने के बाद आख़ें नम और दिल ख़ुश हो जाता है. ऐसी ही एक ख़बर मुंबई से भी आई है. ये कहानी एक ऐसी बच्ची की है, जो हालातों से लड़ कर अपने मम्मी-पापा का सपना पूरा करना चाहती है.
अपने परिवार का सपना पूरा करने का इरादा रखने वाली ये बच्ची इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा में है. दरअसल, Humans Of Bombay ने फेसबुक पोस्ट के माध्यम से एक बच्ची का ज़िक्र किया है, जो उच्च शिक्षा के लिए अपने माता-पिता से दूर हो जाती है. इस लड़की का पोस्ट बेहद भावुक कर देने वाला है.
इस पोस्ट में लिखा गया है, 'मैं एक छोटे से गांव से हूं. मेरे माता-पिता वहीं रहते हैं, लेकिन मैं यहां शहर में अपने अंकल और आंटी के साथ रहती हूं. क्योंकि मैं पढ़ना चाहती हूं. उन्होंने मुझसे कहा है कि मैं बड़ी हो गई हूं, क्योंकि अब मैं पांचवी क्लास में पहुंच गई हूं और मैं उन्हें सही साबित करना चाहती हूं. इसलिए आज मैंने अपना स्कूल फ़ॉर्म ख़ुद पूरा भरा है. मुझे मेरा स्कूल बहुत पसंद है, क्योंकि वहां हम हर दिन कुछ नया सीखते हैं. मराठी मीडियम स्कूल होने के बावजूद वह हमें हिंदी और अंग्रेज़ी भी सिखाते हैं और मैं दोनों भाषाओं में नए शब्द सीखने के लिए उत्साहित रहती हूं.’ 
‘मैं नहीं जानती कि बड़ी होकर मैं क्या बनना चाहती हूं. मैं कुछ करना चाहती हूं, जिससे मेरे माता-पिता को मुझ पर गर्व हो सके. उन्होंने मुझे इतनी दूर भेजा ही इसलिए है, ताकि मैं पढ़ सकूं. मैं वो सब कुछ हासिल करना चाहती हूं, जिससे मेरे मम्मी-पापा पूरे गांव को गर्व से मेरे बारे में बता सकें.'
हम तो यही आशा करते हैं कि इस बच्ची की कोशिश रंग लाएगी और एक दिन ये अपने मम्मी-पापा का सपना ज़रूर पूरा करेगी.
Source : indiatimes

छह साल की विभूति को पढ़ना-लिखना इतना अधिक पसंद है कि वह जनरल नॉलेज के करीब 800 प्रश्न याद कर चुकी है. दूसरी क्लास में पढ़ने वाली विभूति को 10वीं क्लास के फार्मूले जबानी याद हैं.
 छह साल की विभूति
ये बच्ची हिंदी, इंग्लिश और संस्कृत के बड़े-बड़े वाक्य आसानी से पढ़ लेती है. विभूति की याद रखने और पढ़ने की इस विलक्षण प्रतिभा को BBRF (ब्रेन बिहेवियर रिसर्च फाउंडेशन) ने तराशने का बीड़ा उठाया है.

यहां विभूति को अलग-अलग विषयों की पढ़ाई कराई जाती है. इसका नतीजा है कि विभूति अपनी उम्र के दूसरे बच्चों से पढ़ाई में काफी आगे निकल गई है. विभूति की कैल्कुलेशन और लॉगिरिथम को समझने की प्रतिभा भी कमाल की है.

BBRF ने विभूति के ब्रेन मैपिंग में भी कुछ विलक्षण एक्टिविटीज देखी है. उसका IQ लेवल भी बहुत हाई पाया गया है. इसकी वजह से बच्ची अपनी उम्र से ज्यादा कठिन चीजें समझ और सीख पाती हैं.

विभूति अभी 10वीं का एग्जाम देने की तैयारी कर रही है और उसके लिए वह स्कूल की पढ़ाई के अलावा BBRF में अलग से क्लासेज लेती है.

दुनिया में कई लोगों के लिए गूगल में नौकरी मिलना ड्रीम जॉब होता है, लेकिन कई ऐसे भी लोग हैं जो गूगल की नौकरी छोड़ कर समोसे का बिज़नेस करने का बड़ा रिस्क उठा लेते हैं.
मुंबई के मुनाफ़ कपाड़िया ऐसे ही एक शख़्स हैं. गूगल की नौकरी छोड़, उन्होंने अपनी मां के साथ समोसे का बिज़नेस शुरू किया है. जल्द ही उनका मटन समोसा लोगों के बीच मशहूर होने लगा. इतना मशहूर कि फ़ोर्ब्स मैगज़ीन ने दुनिया के तीस साल से कम उम्र के सबसे प्रतिभाशाली लोगों में उनका नाम शामिल कर लिया.



28 साल के मुनाफ़ ने एमबीए की पढ़ाई की थी. एक जगह नौकरी करने के बाद उन्होंने विदेश का रुख़ किया. विदेश में कुछ कंपनियों में इंटरव्यू देने के बाद गूगल में उन्हें नौकरी मिल गई. जून 2011 में उन्होंने गूगल में सेल्स डिपार्टमेंट ज्वाइन किया था, लेकिन फ़िर उसे छोड़ दिया.



दरअसल करीब दो साल पहले मुनाफ़ की दादी की मृत्यु के बाद, उनकी मां कुछ उदास रहने लगी थीं. वे सारा दिन टीवी देख-देख कर परेशान हो जाती थीं. मम्मी को बिज़ी रखने के लिए मुनाफ़ ने सोचना शुरू कर दिया. उसने अपने दोस्तों को घर बुलाया और अपनी मम्मी के हाथ का खाना खिलाया. दोस्तों को भी खाना बहुत पसंद आया, तो उसने अपने आईडिया को बिज़नेस में बदलने का निर्णय लिया.



चूंकि मुनाफ़ दाऊदी बोहरा समुदाय के हैं, इसलिए उन्होंने अपने रेस्टोरेंट का नाम 'द बोहरी किचन' रखा. मटन कीमा समोसा यहां की खास डिशों में शुमार है. समोसे के अलावा यहां नरगिस कबाब, डब्बा गोश्त जैसी डिशेज़ भी मिलती हैं. फ़िल्म इंडस्ट्री में भी इस रेस्टोरेंट का खाना पहुंचता है.



मुनाफ़ के किचन में इस समय 5 लोग काम कर रहे हैं और उनका सालाना टर्नओवर 75 लाख रुपये है. मुनाफ़ अगले कुछ सालों में ये मुनाफ़ा 3 से 5 करोड़ बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं. वाकई प्रतिभाशाली लोग किसी भी क्षेत्र में अपनी राह ढूंढ़ ही निकालते हैं.

कहते हैं कि भगवान धरती पर नहीं होते इसीलिए उन्होंने माता-पिता बनाये. जन्म लेने के बाद एक बच्चा सबसे पहले माता-पिता को ही देखता है, उनकी उंगली पकड़कर चलना, उनके साथ खेलना, जीवन का पहला सबक भी वो अपने पेरेंट्स से ही लेता है. लड़का हो या लड़की उसका बेस्ट फ्रेंड उसके पेरेंट्स ही होते हैं. आप चाहे या न चाहें, लेकिन आपके मन की बात वो समझ ही जाते हैं. लेकिन हम फिर भी उनसे अपने कई सीक्रेट्स छुपा ही लेते हैं, जो कहीं न कहीं हमारे मन में ग्लानी के भाव को भर देते है. लेकिन सवाल-जवाब की वेबसाइट quora ने लोगों को मौका दिया कि वो उन बातों को अपने पेरेंट्स के साथ शेयर करें, जो अभी तक उन्होंने छुपाई थीं, या जो वो बता नहीं पाए. ऐसे ही कुछ सीक्रेट्स हम एक-एक करके आपके साथ शेयर करेंगे.
आज हम जिसका सीक्रेट आपके लिए लेकर आये हैं उनका नाम है, Shovan Chowdhury है और वो quora यूज़र हैं.


Source: Shovan Chowdhury

Shovan ने अपनी पोस्ट में लिखा: 

'मेरी मां हमेशा मुझसे ये पूछती रहती है कि तुम अपने भविष्य के लिए कोई बचत क्यों नहीं करते हो?'
मेरे पापा हमेशा मुझे सुझाव देते हैं कि एक मध्यम वर्गीय परिवार के लिए बचत भविष्य में आने वाली अनिश्चितताओं और परेशानियों को हल करने के लिए बेहद ज़रूरी है. मैं पिछले एक साल से जॉब कर रहा हूं, लेकिन महीने के आखिर में मेरी जेब खाली हो जाती है. देखा जाए तो सच में मेरे पास फ्यूचर लिए कोई सेविंग नहीं है.
मेरे पेरेंट्स को हमेशा लगता है कि मैं फालतू की चीज़ों में पैसा बर्बाद कर रहा हूं. लेकिन न ही मैं सिगरेट पीता हूं और न ही शराब को हाथ लगता हूं. यहां तक कि मैं न ही महंगे कपड़े खरीदता हूं. इसके अलावा मुझे कोई बुरी लत भी नहीं है, जहां मैं पैसा खर्च करता हूं. पिछले एक साल में मैंने अपने ऑफ़िशियल काम के चलते कई Slums (मलिन बस्तियों) का दौरा किया. वहां के लोगों और बच्चों की दयनीय स्थिति देखने के बाद मैंने अपने स्तर पर उन बच्चों के लिए कुछ करने का फ़ैसला किया.
मैं अपने पेरेंट्स को बताना चाहता हूं कि असल में, मैं अपनी सैलरी से उन गरीब बच्चों के लिए पैसे खर्च करता हूं, जिन्हें वास्तव में मदद की ज़रूरत है. मुझे ये जानकर बहुत ही हैरानी हुई कि इन स्लम एरिया में रहने वाले ज़्यादातर बच्चे स्कूल जाना चाहते हैं और वो तरह-तरह की पेंटिंग्स भी बनाते हैं. मैं नियमित रूप से स्कूल में उनके एडमीशन और फीस के लिए उन्हें पैसे भेजता हूं. इसके अलावा मैं उनके लिए स्टेशनरी आइटम्स जैसे किताबें, पेंसिल, कलर्स आदि खरीदता हूं. ऐसा करके मुझे बहुत खुशी मिलती है और आत्म संतुष्टि महसूस करता हूं.
मगर मैंने इसके बारे में अपने पेरेंट्स, रिश्तेदार या किसी भी दोस्त को नहीं बताया है. इसके बारे में कोई नहीं जानता है. ये पोस्ट लिखने से कुछ मिनट पहले ही एक बच्चे की मां का मेरे पास कॉल आया और उन्होंने बताया कि Shovan भाई मेरी बेटी सादिया अपनी क्लास में फ़र्स्ट आई है. सादिया की मां अपनी बेटी की इस सफ़लता के बारे में रोते हुए मुझे बता रहीं थी, उनकी आवाज़ के बजाये मुझे उनका रोना ज्यादा सुनाई दे रहा था. लेकिन ये बात सुनकर मैं कुछ देर के लिए शांत हो गया और क्योंकि मैं अपनी ख़ुशी ज़ाहिर नहीं कर पा रहा था, पर मैं इतना खुश था कि जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है.
उसके बाद मैं अपने कमरे की बालकनी में एक कप चाय लेकर बैठा. बालकनी से, मैंने एक 4-5 साल की एक बच्ची को देखा जो सड़क पर पड़े कूड़े को बीन रही थी. उसके शरीर पर एक फटी हुई पेंट के अलावा कुछ नहीं था, यहां तक कि उसने पैरों में भी कुछ नहीं पहना था. वास्तव में तो इस उम्र में उसे दूसरे बच्चों की तरह अपनी गुड़िया के साथ खेलने-कूदने और पढ़ने-लिखने में बिज़ी होना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि अपना पेट भरने के लिए वो लोगों से भीख मांग रही है, या कूड़ा बीन रही है. ये देखकर कि इन बेघर और बेसहारा बच्चों को पूरे दिन खाने के लिए कुछ नहीं मिलता है, पढ़ाई कहां से करेंगे. ये बहुत ही दुखदायी है. इस छोटी सी बच्ची को ऐसे हालात में देख कर मुझे अन्दर तक खालीपन और लाचारी महसूस हुई.
इसके साथ ही Shovan लिखते हैं, 'मम्मी-पापा, मुझे माफ़ कर दीजिये. लेकिन मैं ऐसा ज़िम्मेदार व्यक्ति नहीं बनना चाहता हूं, जो सिर्फ अपने भविष्य के लिए पैसे बचाए.'
Shovan ने अपनी इस छोटी सी पोस्ट के ज़रिये एक बहुत बड़ा और सार्थक सन्देश दिया है. हमारे देश में भुखमरी और अशिक्षा बढ़ती जा रही है. इस दौड़ती-भागती ज़िन्दगी में हर कोई दूसरे से आगे निकलने की रेस में भाग रहा है, लेकिन देश का भविष्य अन्धकार की गर्त में जाता दिख रहा है. अगर देश का हर समर्थ युवा एक गरीब बच्चे की ज़िम्मेदारी उठा लें तो शायद हम उज्वल भविष्य के साथही पूर्ण रूप से साक्षर देश का निर्माण कर पायेंगे.
धन्यवाद Shovan, और आपको आपके इस सराहनीय कदम के लिए ढेरों शुभकामनाएं!

 फूटा घड़ा 

(cracked-pot)

 

Cracked pot

Motivational story in hindi 

बहुत  समय  पहले  की  बात  है  , किसी  गाँव  में  एक   किसान  रहता  था . वह  रोज़   भोर  में  उठकर  दूर  झरनों  से  स्वच्छ  पानी  लेने  जाया   करता  था . इस  काम  के  लिए  वह  अपने  साथ  दो  बड़े  घड़े  ले  जाता  था , जिन्हें  वो  डंडे  में   बाँध  कर  अपने कंधे पर  दोनों  ओर  लटका  लेता  था .


उनमे  से  एक  घड़ा  कहीं  से  फूटा  हुआ  था  ,और  दूसरा  एक  दम  सही  था . इस  वजह  से  रोज़  घर  पहुँचते -पहुचते  किसान  के  पास  डेढ़  घड़ा   पानी  ही बच  पाता  था .ऐसा  दो  सालों  से  चल  रहा  था .

सही  घड़े  को  इस  बात  का  घमंड  था  कि  वो  पूरा  का  पूरा  पानी  घर  पहुंचता  है  और  उसके  अन्दर  कोई  कमी  नहीं  है  ,  वहीँ  दूसरी  तरफ  फूटा  घड़ा  इस  बात  से  शर्मिंदा  रहता  था  कि  वो  आधा  पानी  ही  घर  तक  पंहुचा   पाता  है  और  किसान  की  मेहनत  बेकार  चली  जाती  है .   

फूटा घड़ा ये  सब  सोच  कर  बहुत  परेशान  रहने  लगा  और  एक  दिन  उससे  रहा  नहीं  गया , उसने  किसान   से  कहा , “ मैं  खुद  पर  शर्मिंदा  हूँ  और  आपसे  क्षमा  मांगना  चाहता  हूँ ?”


“क्यों  ? “ , किसान  ने  पूछा  , “ तुम  किस  बात  से  शर्मिंदा  हो ?”


“शायद  आप  नहीं  जानते  पर  मैं  एक  जगह  से  फूटा  हुआ  हूँ , और  पिछले  दो  सालों  से  मुझे  जितना  पानी  घर  पहुँचाना  चाहिए  था  बस  उसका  आधा  ही  पहुंचा  पाया  हूँ , मेरे  अन्दर  ये  बहुत बड़ी  कमी  है , और  इस  वजह  से  आपकी  मेहनत  बर्वाद  होती  रही  है .”, फूटे घड़े ने दुखी होते हुए कहा.


किसान  को  घड़े  की  बात  सुनकर  थोडा  दुःख  हुआ  और  वह  बोला , “ कोई  बात  नहीं , मैं  चाहता  हूँ  कि  आज  लौटते  वक़्त  तुम   रास्ते में  पड़ने  वाले  सुन्दर  फूलों  को  देखो .”


घड़े  ने  वैसा  ही  किया , वह  रास्ते  भर  सुन्दर  फूलों  को  देखता  आया , ऐसा करने से  उसकी  उदासी  कुछ  दूर  हुई  पर  घर  पहुँचते – पहुँचते   फिर  उसके  अन्दर  से  आधा  पानी  गिर  चुका  था, वो  मायूस  हो  गया  और   किसान  से  क्षमा  मांगने  लगा .


किसान  बोला ,” शायद  तुमने  ध्यान  नहीं  दिया  पूरे  रास्ते  में  जितने   भी  फूल  थे  वो  बस  तुम्हारी  तरफ  ही  थे , सही  घड़े  की  तरफ  एक  भी  फूल  नहीं  था . ऐसा  इसलिए  क्योंकि  मैं  हमेशा  से  तुम्हारे  अन्दर  की  कमी को   जानता  था , और  मैंने  उसका  लाभ  उठाया . 

मैंने  तुम्हारे  तरफ  वाले  रास्ते  पर   रंग -बिरंगे  फूलों के  बीज  बो  दिए  थे  , तुम  रोज़  थोडा-थोडा  कर  के  उन्हें  सींचते  रहे  और  पूरे  रास्ते  को  इतना  खूबसूरत  बना  दिया . आज तुम्हारी  वजह  से  ही  मैं  इन  फूलों  को  भगवान  को  अर्पित  कर  पाता  हूँ  और   अपना  घर  सुन्दर  बना  पाता  हूँ . तुम्ही  सोचो  अगर  तुम  जैसे  हो  वैसे  नहीं  होते  तो  भला  क्या  मैं  ये  सब  कुछ  कर  पाता ?


दोस्तों  हम  सभी  के  अन्दर  कोई  ना  कोई  कमी  होती है  , पर यही कमियां हमें अनोखा  बनाती हैं . उस किसान की  तरह  हमें  भी  हर  किसी  को  वो  जैसा  है  वैसे  ही स्वीकारना चाहिए  और  उसकी  अच्छाई  की  तरफ  ध्यान  देना  चाहिए, और जब हम ऐसा करेंगे तब “फूटा घड़ा” भी “अच्छे घड़े” से मूल्यवान हो जायेगा.
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Note: The inspirational story shared here is not my original creation, I have read and heard  it several times and I am just providing a Hindi version of the same.

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दुनिया की सबसे युवा सीईओ श्रीलक्ष्मी सुरेश

 Youngest ceo in the world sreelakshmi suresh 

यह पोस्ट एक असामान्य बुद्धिमत्ता और विशेष कौश्यल्य प्राप्त की हुयी लडकी श्रीलक्ष्मी सुरेश के बारे मे है. 

आप श्रीलक्ष्मी सुरेश के बारे में और अधिक जानना चाहते है तो  sreekutty.com वेबसाइट पे विजिट करे

श्रीलक्ष्मी सुरेश / sreelakshmi suresh. केरल के कोझिकोडे जिले में रहनेवाली इस 9 साल की बच्ची ने यह साईट बनाई है. केरल बार काउंसिल.कॉम इस कानून के बारे मे वेबसाइट की डिझाइन करने वाले edesign.co.in कम्पनी की वो सीईओ भी है. 

श्रीलक्ष्मी ने इसके पहले भी 10 वेबसाइट बनाई है इसमे उसके स्कूल की और बहरे बच्चों के लिए बनाये हुए साईट का समावेश है.

श्रीलक्ष्मी को बहुत से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड मिले हुए है, असोसिएशन ऑफ़ अमेरिकन वेबमास्टर्स इस संस्था की 18 साल के निचेवाले उम्र की वो अकेली सभासद है, और इस संस्था ने उसको सर्वोच्च ऐसे गोल्ड वेब अवार्ड ने पुरस्कृत किया है



इतना ही नहीं तो इस असमान्य लड़की को इन्फोग्रुप( Infogroup ) इस कम्पनी ने अपनी ब्रांड अम्बेसिटर के लिए चुना है.

यह लेख लिखने के पिछे का उद्देश्य यह इतनाही बताना है की यश मिलने के लिए कभ्ज भी उम्र के बिच मै नहीं आती आप 15 साल के हो या 50 सालके, सफलता मिलने के लिए सिर्फ मेहनत और जिद यह दो ही बात की जरुरत होती है.

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