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हर रोज़ हमारे दोस्त, यार, रिश्तेदार सोशल मीडिया पर कई फ़ोटोज़ पोस्ट या फिर शेयर करते हैं. कई बार ये तस्वीरें थोड़ी हट के होती हैं, हट के मतलब अजीबोगरीब. हैरत की बात ये है कि तेज़ी से वायरल हो रही इन फ़ोटोज़ पर हम आंख मूंद कर विश्वास भी कर लेते हैं, वो भी बिना ये सोचे कि ये सब फ़ेक भी हो सकता है.

कई बार तो इन तस्वीरों के ज़रिए लोगों की भक्ति भावना के साथ भी खिलवाड़ किया जाता है. कैसे? एक बार इन फ़ोटोशॉप की गई तस्वीरों को देखिए, सब ख़ुद-ब-ख़ुद समझ आ जाएगा.

1. समझ आया कुछ अंतर?












2. लो रशिया के प्रेज़िडेंट को भी नहीं छोड़ा.










3. देखिए किस तरह लोगों की भावनाओं के साथ छेड़छाड़ की जाती है.
















4. फ़ोटोशॉप का कमाल!














5. बोला था न आंखों से दिखने वाली हर चीज़ सच नहीं होती.











6. समझ नहीं आता आखिर ये सब क्यों?






7. अबतक तो आपको ये खेल समझ आ गया होगा.










8. इसकी वजह नेपाल भूकंप नहीं, बल्कि ये बच्ची किसी अजनबी को देख डर गई थी.







9. ये लड़की Angel of Kobane नहीं, एक लॉ स्टूडेंट थी.






10. ये तस्वीर एक प्रोजेक्ट के तहत ली गई थी.














Source : dailymail


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"क्या आप जानते है, रात को मोजे पहनकर सोने के ये चमत्कारी फायदे..?"

इंटरनेट डेस्क:
 अगर हम आपको बताएं कि मौजे पहनने से आपको बहुत सारे फायदे मिल सकते हैं तो क्या आप यकीन करेंगे। जी हां, बिल्कुल मौजे पहनने से आपको कई फायदे मिल सकते है। आपके पैरों से जुड़ी कई परेशानियां दूर हो सकती हैं।
कई लोगो की समस्या होती है कि सोने के बाद भी उनके पैर ठंडे ही रहते है गर्म नहीं होते। अगर आप इस समस्या से छुटकारा पाना चाहते है तो मोजे पहनकर सोना चाहिए इससे आपके पैर गर्म रहेंगे।

कई लोगों को पैरों में काफी पसीना आता है। इस स्थिति को हाइपरहाइड्रोसिस कहते हैं। अगर आप पैरों से अत्यधिक पसीना आने की समस्या से परेशान हैं तो ऐसे में मोजा पहनकर सोना चाहिए। यह आपके लिए फायदेमंद होगा।
मोजे पहनकर सोने से पैर गंदगी और बैक्टीरिया से बचे रहते है जिससे कि पैर किसी भी तरह से संक्रमित होने से बच जाते हैं।


कुछ लोगों की यह समस्या होती हैं कि जब वह सुबह उठते हैं तो उनके पैर ड्राई रहते है। ऐसे में आप रात को सोने से पहले पैरों पर तेल से मसाज करें और मौजे पहन कर सो जाएं। ऐसा करने से पैरों की ड्राई समस्या खत्म हो जाएगी।
अगर आप रात को मोजे पहनकर सोते है तो मोज़े पहन कर सोने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आपकी एड़ियां मुलायम रहती हैं और फटती भी नहीं।


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बच्चे पढ़ाई के लिए आजकल इंटरनेट का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। इसे अगर आभासी पैंडोरा बॉक्स कहा जाये तो अतिश्योक्ति न होगी। यह बड़ों ही नहीं बल्कि बच्चों के लिए भी एक खास जरूरत बन गई है।


अपनी पढ़ाई के लिए बच्चे इंटरनेट के माध्यम से ही सूचनाओं को जुटाकर अपना प्रोजेक्ट वर्क तैयार करते हैं। कंप्यूटर ही नहीं बल्कि बच्चे भी इंटरनेट के ऐसे वायरस का शिकार हो सकते हैं, जो उनकी सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है। इंटनेट से पैदा होने वाले खतरों की एक लंबी लिस्ट है, जिससे बच्चे की सुरक्षा की जानी चाहिए।




सवाल है इस बारे में पैरेंट्स क्या कर सकते हैं? अपने बच्चे को सुरक्षित रखें…. बच्चे के कंप्यूटर की पीन पर नजर रखें कंप्यूटर को इस दिशा में रखें कि उसकी पीन पर आपकी नजर रहे। इसके द्वारा आपका बच्चा कंप्यूटर पर क्या कर रहा है, इसको अच्छी तरह देखा जा सकता है। बच्चे से बात करें बच्चे को दिन भर कंप्यूटर की पीन पर जमे रहने से बचाने के लिए उसे कभी-कभी बाहर लेकर जायें।

अपने बच्चे के साथ बैें और खुद भी सर्फिंग करें। खुद भी इंटरनेट के नियमों का पालन करें। खतरा दिखे तो सावधान हो जायें बच्चे को इंटरनेट का इस्तेमाल कैसे करना है, उसे अपनी सुरक्षा कैसे करनी है, इसके बारे में उसे दिशा निर्देश दें। यदि आपका कोई करीबी या जानकार इंटरनेट के इस्तेमाल से किसी संकट से गुजर चुका है तो उससे बात करें और बच्चे को उसकी कहानी बनाकर इस तरह बतायें जिससे उसे इंटरनेट का सुरक्षित इस्तेमाल करने की सीख मिल सके।

इंटरनेट के बारे में खुद भी जानें आपका बच्चा इंटरनेट पर क्या कर रहा है, इसके बारे में खुद भी जानें। स्वयं भी कंप्यूटर का ज्ञान हासिल करें। पहले धीरे-धीरे अभ्यास करें। अभ्यास से आप खुद ही सीख सकते हैं।

बचाव कैसे करें:- 

सेक्स, हिंसा, पॉर्नोग्राफी से संबंधित सामग्री को ब्लॉक करें ताकि बच्चा इन्हें चोरी छुपे न देख सकें। 

बच्चा यदि पॉर्नोग्राफी देखे… 

बचाव कैसे करें अगर आपको पता चलता है कि आपका बच्चा इंटरनेट पर चोरी छुपे पॉर्नोग्राफी देखता है तो पति-पत्नी दोनो मिलकर बच्चे के साथ बात करें। उसे अनुशासित करें बच्चे के लिए इंटरनेट इस्तेमाल करने का समय निर्धारित करें।




यदि वह तय सीमा से ज्यादा इसका इस्तेमाल करता है तो सख्ती से उसे मना करें। यदि वह आपसे अनुनय विनय करके तय समय सीमा से ज्यादा इसका इस्तेमाल करना चाहता है तो उसके लिए इंटरनेट इस्तेमाल करने की समय सीमा बढ़ा दें। भूल जायें अगर आपको पता चलता है कि बच्चा आपकी अनुपस्थिति में पॉर्नेग्राफी देखने में अपना समय बर्बाद करता है तो बच्चे को इस बात के लिए बार-बार बेइज्जत न करें।

इसका बच्चे पर बुरा असर हो सकता है। उसके लिए नियम निर्धारित करें और उसे भी थोड़ा समय दें। इंटरनेट से बच्चे को खुद भी जानकारी लेना सिखायें आजकल बच्चे को क्लास में जो भी पढ़ाया जाता है, बच्चे वह सब इंटरनेट पर ही पढ़ना चाहते हैं। उसके साथ खुद भी इंटरनेट पर पढ़ने की सामग्री देखें और उसे पढ़कर समझकर खुद समझाने का प्रयास करें।

बच्चे को जो चीजें अच्छी लगती हैं उन्हें खुद डाउनलोड करें ताकि वे उनका दोबारा इस्तेमाल कर सकें। 

खतरे का संकेत… 

-बच्चा अगर इंटरनेट पर ज्यादा समय तक रहता है, वह घर से बाहर खेलने भी नहीं जाता।

-कंप्यूटर पर आपको कुछ ऐसी चीजें देखने को मिलती है, जिन्हें आप बच्चे के लिए सही नहीं मानते। 

-जब आप कमरे में आते हैं तो वह तुरंत कंप्यूटर का मॉनिटर ऑफ कर देता है। 
-वह दूसरों से बातचीत करना पसंद नहीं करता। 

-उसे पूरे समय कंप्यूटर पर ही रहना अच्छा लगता है। 

-वह पढ़ाई में लगातार पिछड़ रहा हो।

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बॉलीवुड फिल्में देखकर और दुनिया की सुनकर लगता है कि पृथ्वी पर ऐसा कुछ नहीं जो गूगल, अमरीका और ब्रिटेन की ख़ुफ़िया एजेंसियों से छिपा हो. लेकिन ये गलत है. इंटरनेट का एक हिस्सा ऐसा भी है, जो दुनिया की नज़रों से ओझल है. इंटरनेट के इस स्याह पाताल को कोई ‘डार्क वेब’ कहता है तो कोई ‘डीप वेब’ जहाँ आप भी जा सकते हैं. यहाँ अवैध हथियारों और ड्रग्स के सौदे होते हैं. यहाँ आपकी बेहद निजी जानकारी से लेकर चाइल्ड पोर्न तक सबकुछ मंडी के माल की तरह बोली लगाने के लिए सामने पड़ा है.जिसे आप इंटरनेट का संसार मानते हैं वो केवल चार फ़ीसदी है. बाक़ी 96 फ़ीसदी दुनिया डार्क है.




इंटरनेट की तीन परतें

पहली परत है सरफेस वेब
इसे हम सर्च इंजन के ज़रिए देख सकते हैं. एक्सेस कर सकते हैं. जब से पहला ब्राउज़र बना तब से सरफेस वेब, वर्ल्ड वाइड वेब का हिस्सा है. यानी जो भी सर्च इंजन से दुनिया खोज सकती है, वह सरफेस वेब है. सरफेस वेब के नीचे की परत डीप वेब है और उसके नीचे डार्क वेब.

डीप वेब
साल 2001 में कम्प्यूटर साइंटिस्ट माइकल के बर्गमैन ने 'डीप वेब' टर्म इजाद की. डीप वेब का कॉन्टेंट सर्च नहीं कर सकते. इसका कॉन्टेंट HTML फॉर्म में छिपा रहता है. 2015 में अमेरिकी फ़िल्ममेकर एलेक्स विंटर ने 'डीप वेब' नाम की एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई थी. डेढ़ घंटे की इस डॉक्यूमेंट्री में डीप वेब इस्तेमाल करने वालों का इंटरव्यू लिया गया था और दिखाया गया था कि कैसे यूज़र्स डीप वेब की रहस्यमयी दुनिया में जाते हैं. डीप वेब में कई वेबसाइट छिपी हैं. इन्हें एक्सेस करने के लिए स्पेशल ब्राउज़र डकडकगो की ज़रूरत होती है. यहां ड्रग्स की ख़रीद-फ़रोख्त और ऐसे ही कई ग़ैरक़ानूनी व्यापार बेखटके चलते हैं.



डार्क वेब
तीसरी या अंतिम परत है डार्क वेब, जो अदृश्य है. यह डीप वेब से भी नीचे है. यह वर्ल्ड वाइड वेब का अँधेरा गटर है. यहाँ कोई भी मुंह उठाए क्रोम या मोज़िला के ज़रिये नहीं पहुँच सकता. डार्क वेब तक स्पेशल एक्सेस के ज़रिए ही पहुँचा जा सकता. यहां हर चेहरा नकाब में हैं.


इस बाज़ार में आने-जाने वाले हर आदमी की जानकारी छिपी रहती है. डार्क वेब तक पहुँचने के लिए ख़ास सॉफ्टवेयर चाहिए. ये सॉफ्टवेयर हर एक्टिविटी को काली परतों में रखते हैं, लेकिन नौसिखिए पकड़े भी जाते हैं. डार्क वेब तक पहुँचना बेहद ख़तरनाक है. इस बाज़ार में आने-जाने वाले अगर कहीं रास्तों में पकड़े गए तो दुनिया की सरकारें उन्हें मुजरिम मान लेती हैं और वैसा ही सुलूक भी करती हैं.

 

डार्क वेब में घुसने के पहले ये पढ़ें
इंटरनेट पर डीप और डार्क वेब में जाने वालों के क़िस्से Reddit जैसी जगहों पर मौजूद हैं. इनमें मानव मांस की रेसिपी से लेकर, क़त्ल की सुपारी, ड्रग्स, हथियारों और आपके आधार, बैंक अकाउंट या पैन नंबरों के नीलामी होती हैं. एक रेडिट यूज़र के मुताबिक़, जैसे ही वो डीप वेब पर गया तो दूसरी तरफ़ से किसी ने उसे उसके सरनेम से पुकारा. इसके बाद उसने कई दिन तक इंटरनेट इस्तेमाल करना छोड़ दिया. इसी तरह एक और रेडिट यूज़र का कहना है कि डार्क वेब पर जाते ही उसे किसी अज्ञात नंबर से कॉल आई और दूसरी तरफ़ से किसी ने कुछ नहीं कहा. कुछ देर बाद उसकी स्क्रीन पर ब्लैक कलर में फ्लैश हुआ 'We can see you'.

डार्क वेब पर 'हिटमैन' या सुपारी लेकर क़त्ल करने वाले भी हैं. एक रेडिट यूज़र ने अपने अनुभव में लिखा  'जैसे ही मैं डार्क वेब पर गया वहां एक वेबसाइट पर हिटमैन का विज्ञापन फ़्लैश हुआ. उसकी सर्विस के लिए बिटकॉइन में पैसे चुकाने थे. वह आम लोगों, पुलिस वालों और नेताओं को मारने की फ़िरौती ले रहा था.'

डार्क वेब किस कोख से जन्मा?
डार्क वेब अमेरिकी सरकार की देन है. नब्बे के दशक में अमेरिकी सेना ने जासूसी के लिए इसे बनाया था. डार्क वेब को इसलिए बनाया गया था कि सरकारी जासूस गुमनाम तौर पर सूचनाएं ले-दे सकें. यह साफ़ है कि इसे बनाने का मक़सद दूसरे देशों की जासूसी करना था. लेकिन अमरीका का यह हथियार अमरीका को भी महंगा पड़ा. जूलियन अंसाज विकीलीक्स को डार्क वेब पर ही चलाते हैं. अमरीकी सेना ने यहां तक जाने के लिए Tor टेक्नोलॉजी विकसित की. कुछ ही वक़्त में Tor को पब्लिक डोमेन में रिलीज़ कर दिया गया, ताकि इसका इस्तेमाल सार्वजनिक हो सके. Tor के ज़रिए ही डार्क वेब तक पहुँचा जा सकता है. इस वक़्त Tor पर 30 हज़ार से ज़्यादा अदृश्य वेबसाइट हैं.

क्या है Tor?
Tor एक सॉफ्टवेयर है, जो यूज़र्स की पहचान और इंटरनेट एक्टिविटी को ख़ुफ़िया एजेंसियों की नज़रों से बचाता है. यानी इसके ज़रिए इंटरनेट एक्टिविटी को ट्रेस नहीं किया जा सकता. लोग इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल अपना आईपी एड्रेस छिपाने के लिए करते हैं. Tor पर सर्फ़िंग के दौरान आप किसी यूज़र की सोशल मीडिया पोस्ट, ऑनलाइन एक्टिविटी, सर्च हिस्ट्री, वेबमेल किसी भी चीज़ का पता नहीं लगा सकते.

कंप्यूटर क्यों मांगता है कैप्चा ? आपको पता है ‘कैप्चा’ का इतिहास..
कैप्चा का इतिहास – आजकल जमाना इंटरनेट का है।
इंटरनेट की मदद से हम किसी भी काम के मिनटों में ही खत्म कर सकते हैं। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा काम होगा जो इंटरनेट की मदद से संभव नहीं होगा। लेकिन जब इंटरनेट की मांग तेजी से बढ़ने लगी तो लोगों ने इसका दुरुपयोग करना भी शुरू कर दिया और इंटरनेट के जरिये लोगों को धोखाधड़ी का शिकार बनाने लगे।
इंटरनेट की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कैप्चा का प्रयोग किया जाने लगा।
आखिर क्या है ये कैप्चा और क्या है इसका इतिहास आइए जानते हैं।
जानिए क्या है कैप्चा:
कैप्चा को ‘कंप्लीटेड ऑटोमेटेड पब्लिक टर्निंग टेस्ट टू टेल ह्यूमन अपार्ट’ कहा जाता है। कैप्चा की मदद से कंप्यूटर इस बात की पुष्टि करता है कि यूजर मानव है या फिर नहीं। इस जांच को कंप्यूटर की मदद से पूरा किया जाता है इसलिए इसे ‘रिवर्स टर्निंग टेस्ट’ भी कहा जाता है। कैप्चा में अल्फाबेट और नंबर होते हैं। एक आम आदमी को कैप्चा टेस्ट को हल करने में कम से कम 15 सेकेंड का समय लगता है।
क्या है कैप्चा का इतिहास:
कैप्चा का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है। इंटरनेट के शुरुआती दिनों में कई लोग पेज के टेक्स्ट के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश करते थे। इससे बचने के लिए साल 2000 में कैप्चा का आविष्कार किया गया। हालांकि इसके आविष्कार के पीछे कई तरह की बातें सामने आतीं हैं। कैप्चा सबसे आसान और आम प्रारूप साल 1997 में आया था। साल 1997 में इसका आविष्कार दो अलग-अलग समूहों ने मिलकर किया था और इसलिए दोनों ही इसके आविष्कारक माने जाते हैं। साल 2003 में लुईस वोहन की टीम ने इसके बारे में जानकारी दी और तबसे ही ये लोगों के बीच खासा प्रचलित हो गया।
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"कंप्यूटर क्यों मांगता है कैप्चा ? आपको पता है ‘कैप्चा’ का इतिहास.."
ये है कैप्चा का इतिहास – इंटरनेट की दुनिया में आज हैकिंग की समस्या बहुत तेजी से फैल रही है। हैकर हर समय लोगों की जरूरी जानकारियां हैक करने की फिराक में रहते हैं और इस लिहाज से कैप्चा हम सबके लिए बहुत सहायक है। क्योंकि जब तक कोई यूजर कैप्चा के सही शब्द नहीं लिख देता वो पेज के अगले भाग में नहीं जा सकता। कैप्चा हमें हैकरों से बचाने में बहुत सहायक है। कैप्चा के आने से हैकिंग में भी काफी कमी आई है। एक कैप्चा को सुलझाने में यूजर को कम से कम 15 सेकेंड का समय लगता है।

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इंटरनेट का मालिकाना हक़: जानिए किसके पास है INTERNET का मालिकाना हक़ ?
इंटरनेट का मालिकाना हक़ – आज के इस युग में इंटरनेट की बहुत अहमियत हो चुकी है।
सरकार से लेकर बड़ी-बड़ी उद्योग कम्पनियां भी इंटरनेट के अधीन हैं। खास आदमी से लेकर सरकार के खुफिया दस्तावेजों तक की जानकारी इंटरनेट पर मौजूद है। तो सोचिये अगर इंटरनेट किसी के अधीन होता या किसी व्यक्ति, देश या कम्पनी के अधिकार में होता तो वो पूरी दुनिया पर राज करता और दुनिया का सबसे धनवान व्यक्ति होता।
ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि इंटरनेट किसी का मोहताज हो या उस पर कोई अपना मालिकाना अधिकार जता सके।
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'इंटरनेट का मालिकाना हक़: जानिए किसके पास है INTERNET का मालिकाना हक़ ?'
इंटरनेट को नियंत्रण में लाने को लेकर अकसर अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर बहस चलती रहती  इसे नियंत्रण में लिया जाए या नहीं। वैसे देखा जाए तो अमेरिका का इंटरनेट पर काफी हद तक दबदबा है क्योंकि ICANN (इंटरनेट कॉरपोरेशन फॉर असाइंड नेम्स एंड नम्बर्स) जैसी मूलभूत कम्पनियां अमेरिका में ही स्थित हैं जिसके कारण इंटरनेट का मालिकाना हक़ अमरिका का माना जाता है।
इंटरनेट का मालिकाना हक़ वैसे किसीके पास नहीं है – इंटरनेट पर किसी का भी एकछत्र राज नही है लेकिन कई देशों का मानना है कि बढते साइबर क्राइम को देखते हुए इंटरनेट को सरकार के अधीन होना चाहिए ताकि इसका कोई दुरुपयोग ना कर सके।
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"इंटरनेट का मालिकाना हक़: जानिए किसके पास है INTERNET का मालिकाना हक़ ?"
3.7 बिलियन इंटरनेट यूज़र्स जितनी बडी जनसंख्या को इंटरनेट प्रदान करने के लिए इंटरनेट एड्रेसिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है जिन्हें सर्विस प्रोवाइडर का नाम दिया गया है।
दुनियाभर के सभी इंटरनेट यूज़र्स के लिए इंटरनेट उपलब्ध कराने के लिए सर्विस प्रोवाइडर को तीन भागो में बांट गया है। पहले स्तर पर सर्विस प्रोवाइडर्स को दुनिया से जोड़ने वाली कम्पनियां आती हैं और दूसरे स्तर की कम्पनियां सर्विस प्रोवाइडर्स को राष्ट्रीय स्तर पर जोडती हैं। लेकिन आम जनता तक तीसरे स्तर के सर्विस प्रोवाइडर्स बड़ी-बड़ी कम्पनियों से जुड़कर इंटरनेट प्रदान कराते हैं।
देखा जाए तो इंटरनेट किसी के भी अधीन नही है और ना ही इस पर कोई अपना मालिकाना अधिकार जता सकता है।
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