हमारे हाथों की रेखा में कुछ लकीरें ऐसी भी होती है जिनका अर्थ हमें पता नहीं होता है, लेकिन वो लकीर उस व्यक्ति के स्वभाव के बारे में बहुत कुछ बोलती है। दरअसल प्राचीन सभ्यता के लोगों में हाथों और शरीर की बनावट को देखकर भाग्य को जानने की कला थी जिसको भारत में सामुद्रिक शास्त्र कहते है वही प्राचीन मिश्र के लोग भी इस विज्ञान को भलीभाँति समझते थे।
इंसान की हथेली में जो रेखाएँ होती है उसके आधार पर सुख-दुःख और व्यक्तिगत स्वभाव का पता लगाया जा सकता है
तो चलिए जानते है हाथों की रेखा के कुछ विशेष प्रभाव के बारे में -
जिस व्यक्ति के हाथ में बुद्धि रेखा,मस्तिष्क रेखा और जीवन रेखा को मिलकर अंग्रेजी का M अक्षर बनता है वह अधिक बुद्धिशाली होते है इसलिए ऐसे लोग स्वतंत्र व्यापार करें, तो काफी सफल व्यक्ति बन सकते है क्योंकि ऐसी रेखा बड़े-बड़े बिज़नेस मैन की हथेलियों में पाई जा चुकी है। अगर ऊपर बताई रेखा स्त्री और पुरुष दोनों के हाथों में हो, तो उनका वैवाहिक जीवन राधा और कृष्ण के समान होता है अर्थात दोनों के बीच अधिक बनती है।
यदि किसी व्यक्ति के हाथ में अंग्रेजी अक्षर X का चिन्ह होता है तो वह आने वाले समय में उच्च अधिकारी अथवा राजा के समान सुख भोगता है क्योंकि ऐसी रेखा सिंकदर और सम्राट अशोक के हाथों में पायी जा चुकी है।
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Jawaharlal Nehru Ke Anmol Vichar : पंडित जवाहर लाल नेहरू को कौन नहीं जानता वह हमारे स्वतंत्र देश के पहले प्रधान मंत्री थे जिनके विचारो से हम सभी लोगो को प्रेरणा मिलती है जिनका व्यक्तित्व काफी प्रेरणादायक है और हमें आत्मविश्वास देता है इसीलिए हम आपको उनके द्वारा कहे गए कुछ कथन के बारे में बताते है जो की हमारे लिए महत्वपूर्ण है | नेहरू जी के विचार हमारे लिए मोटिवेशनल विचार सिद्ध हो सकते है इसीलिए हम आपको उनके विचारो को बारे में बताते है जिन्हे पढ़ कर आप अपना कॉन्फिडेंस बढ़ा सकते है और अपनी नकारात्मक सोच को ख़त्म करके पॉजिटिव थिंकिंग अपना सकते है अपने जीवन का लक्ष्य भी हासिल कर सकते है और अपने जीवन में सफलता भी प्राप्त कर सकते है |
नेहरू जी के विचार
Nehru Ji Ke Vichar : नेहरू जी द्वारा कहे गए कुछ ऐसे ही आत्मविश्वास बढ़ाने वाले विचारो को पढ़े तथा उनके चरित्र के बारे में भी जाने :
एक नेता या कर्मठ व्यक्ति संकट के समय लगभग हमेशा ही अवचेतन रूप में कार्य करता है और फिर अपने किये गए कार्यों के लिए तर्क सोचता है
हमें थोडा विनम्र रहना चाहिए और यह न सोचें कि शायद सत्य पूर्ण रूप से हमारे साथ ना हो
एक ऐसा क्षण जो इतिहास में बहुत ही कम आता है , जब हम पुराने के छोड़ नए की तरफ जाते हैं , जब एक युग का अंत होता है , और जब वर्षों से शोषित एक देश की आत्मा , अपनी बात कह सकती है
हर हमलावर देश की यह दावा करने की आदत होती है कि यह कार्य वह अपनी रक्षा के लिए कर रहा है
संकट और गतिरोध जब वे होते हैं तो कम से कम उनका एक फायदा होता है कि वे हमें सोचने पर मजबूर करते हैं
शांति राष्ट्रों का सम्बन्ध नहीं है. यह एक मन: स्थिति है जो आत्मा की निर्मलता से आती है . शांति सिर्फ युद्ध का अभाव नहीं है.यह मन की एक अवस्था है
किसी को सुझाव देना और बाद में हमने जो कहा उसके नतीजे से बचने की कोशिश करना बेहद आसान है
समाजवाद…ना केवल जीने का तरीका है, बल्कि सामजिक और आर्थिक समस्यों के निवारण के लिए एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है
हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम चीजों के बारे में बातें ज्यादा करते हैं और काम बहुत कम
यदि पूंजीवादी समाज की शक्तियों को अनियंत्रित छोड़ दिया जाए तो वो अमीर को और अमीर और गरीब को और गरीब बना देंगी
जवाहर लाल नेहरू का नारा
Jawahar Lal Nehru Ka Nara : जवाहर लाल नेहरू जी के विचार उनके द्वारा कहे गए नारो में भी देखने को मिलते है इसीलिए हम आपको उनके कुछ नारो के बारे में बताते है जप की उनके द्वारा कहे गए है :
समय सालों के बीतने से नहीं मापा जाता बल्कि किसी ने क्या किया, क्या महसूस किया , और क्या हांसिल किया इससे मापा जाता है
अच्छी नैतिक स्थिति में होना कम से कम उतना ही प्रशिक्षण मांगता है जितना कि अच्छी शारीरिक स्थिति में होना
हम एक अद्भुत दुनिया में रहते हैं जो सौंदर्य, आकर्षण और रोमांच से भरी हुई है. यदि हम खुली आँखों से खोजे तो यहाँ रोमांच का कोई अंत नहीं है
कोई ऐसा पल जो इतिहास में बहुत कम बार आता है वह है पुराने को छोड़कर नए की तरफ जाना
जब तक मुझे खुद लगता है की किया गया काम सही काम है तब तक मुझे संतुष्टि रहती है
योग्य और वफादार लोग हमेशा महान उद्देश्यों के लिए कार्य करते है,उन्हें भले ही तब पहचान न मिले किन्तु अंत में पहचान मिल ही जाती है
हम वास्तविकता में क्या हैं यह अधिक मायने रखता है बजाय इसके कि लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं
जब भी हमारे सामने संकट और गतिरोध आते है, उनसे हमें एक फायदा तो होता है कि वे हमें सोचने पर मजबूर करते है
हमे असफलता तभी मिलती है जब हम अपने उद्देश्य,आदर्श और सिद्धांतो को भूल जाते है
अगर मैं आश्वस्त हूँ कि मैं सही कदम उठा रहा हूँ, तो वह कदम ही मुझे संतुष्टि प्रदान करता है
श्लोगान ऑफ़ जवाहरलाल नेहरू
Slogan Of Jawaharlal Nehru : जवाहर लाल नेहरू जी के स्लोगन हम सबके लिए प्रेरणादायक होते है जिनमे से देशभक्ति की झलक और देश के प्रति उनका प्यार झलकता है :
अच्छी नैतिक स्थिति में होना कम से कम उतना ही अभ्यास मांगता है जितना कि अच्छी शारीरिक स्थिति में होना
अज्ञानता बदलाव से हमेशा डरती है
असफलता तब मिलती है जब हम अपने आदर्श, उद्देश्य और सिद्धांत भूल जाते हैं
आप तस्वीरों के चेहरे दीवार की तरफ मोड़ के इतिहास का रुख नहीं बदल सकते
एक नेता और एक कर्मशील पुरुष संकट के समय लगभग हमेशा ही पहले अपने अंतस की आवाज के अनुसार काम करते हैं फिर बाद में उस काम को करने के कारण खोजते हैं
एक सिद्धांत का वास्तविकता के साथ संतुलन बहुत जरुरी है
खतरा देख कर भागने का प्रयास करने वाला व्यक्ति अपने आप को ज्यादा खतरे में डाल लेता है मुकाबलें उस व्यक्ति के, जो शांत बैठ कर खतरे का सामना करने की योजना बना रहा हो
जरुरत से ज्यादा सतर्क रहने की नीति सभी खतरों में सबसे बड़ा खतरा है
जाहिर है, दक्षता का सबसे अच्छा प्रकार वह है जो मौजूदा सामग्री का अधिकतम लाभ उठा सके
जीवन ताश के पत्तों के खेल की तरह है. आपके हाथ में जो है वह नियति है, जिस तरह से आप खेलते हैं वह स्वतंत्र इच्छा है
जवाहर लाल नेहरू के राजनीतिक विचार
Jawahar Lal Nehru Rajneetik Vichar : जवाहर लाल नेहरू राजनीति से ताल्लुक रखते थे वह आज़ाद भारत के सबसे पहले प्रधान मंत्री जिनके राज्य में भारत में कई गुना तरक्की पायी है :
जो तथ्य हैं वे हैं और आपके नापसंद करने से गायब नहीं हो जायेंगे
जो व्यक्ति अधिकतर अपने ही गुणों का बखान करता रहता है वो अक्सर सबसे कम गुणी होता है
नागरिकता देश की सेवा में निहित है
पूर्ण रूप से आन्दोलनकारी रवैया किसी विषय की गहन विवेचना के लिए ठीक नहीं है
महान कार्य और छोटे लोग साथ नहीं चल सकते
मैं पूर्व और पश्चिम का अनूठा मिश्रण बन गया हूँ, हर जगह बेमेल सा, कहीं पर भी घर जैसा महसूस नहीं करता
यदि पूंजीवादी समाज की शक्तियों को अनियंत्रित छोड़ दिया जाए तो वो अमीर को और अमीर और गरीब को और गरीब बना देंगी
लोकतंत्र अच्छा है . मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि बाकी व्यवस्थाएं और भी बुरी हैं
लोकतंत्र और समाजवाद लक्ष्य पाने के साधन मात्र हैं, अपने आप में लक्ष्य नहीं
लोगों की कला उनके दिमाग का सत्य प्रतिबिम्ब है
वह व्यक्ति जो सबकुछ पा चुका है, वह चाहता है कि हर बात शांति और व्यवस्था के पक्ष में हो
शांति के आभाव में बाकी सारे सपने विलुप्त हो जाते हैं और राख में मिल जाते हैं
शांति राष्ट्रों का सम्बन्ध नहीं है. यह एक मन: स्थिति है जो आत्मा की निर्मलता से आती है. शांति सिर्फ युद्ध का अभाव नहीं है. यह मन की एक अवस्था है
आज के समय में अधिकांश लोगों को धन संबंधी सुख पाने के लिए अतिरिक्त श्रम करना पड़ता है। फिर भी बहुत ही कम लोग अधिक श्रम के बाद भी पर्याप्त प्रतिफल प्राप्त कर पाते हैं। व्यक्ति को कुछ कामों में तो सफलता मिल जाती है, लेकिन कुछ कामों में असफलता का मुंह भी देखना पड़ता है। यदि आप सफलता का प्रतिशत बढ़ाना चाहते हैं तो यहां एक चाणक्य नीति बताई जा रही है। इस नीति का ध्यान रखेंगे तो आपको अधिकतर कार्यों में सफलता मिल सकती है। हम जब ज्यादा कामों में सफल होंगे तो धन संबंधी लाभ भी मिलेगा और इस प्रकार धन संचय होने लगेगा।
चाणक्य कहते हैं कि-
क: काल: कानि मित्राणि को देश: कौ व्ययागमौ।
कस्याऽडं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुंहु:।।
यह चाणक्य नीति के चतुर्थ अध्याय का 18वां श्लोक है। इस श्लोक में चाणक्य ने बताया है कि हमें कार्यों में सफलता पाने के लिए किन 6 बातों को हमेशा सोचते रहना चाहिए। इन बातों का ध्यान रखकर काम करेंगे तो असफलता मिलने की संभावनाएं काफी कम हो जाती हैं।
पहली बात: यह समय कैसा है
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि वही व्यक्ति समझदार और सफल है, जिसे इस प्रश्न का उत्तर हमेशा मालूम रहता है। समझदार व्यक्ति जानता है कि वर्तमान समय कैसा चल रहा है। अभी सुख के दिन हैं या दुख के। इसी के आधार पर वह कार्य करता हैं। यदि सुख के दिन हैं तो अच्छे कार्य करते रहना चाहिए और यदि दुख के दिन हैं तो अच्छे कामों के साथ धैर्य बनाए रखना चाहिए। दुख के दिनों में धैर्य खोने पर अनर्थ हो सकता है।
दूसरी बात: हमारे मित्र कौन-कौन हैं
हमें यह मालूम होना चाहिए कि हमारे सच्चे मित्र कौन-कौन हैं और मित्रों के वेश में शत्रु कौन-कौन हैं। शत्रुओं को तो हम जानते हैं और उनसे बचते हुए ही कार्य करते हैं, लेकिन मित्रों के वेश में छिपे शत्रु का पहचाना बहुत जरूरी है। यदि मित्रों में छिपे शत्रु को नहीं पहचान पाएंगे तो कार्यों में असफलता ही मिलेगी। ऐसे लोगों से भी बचना चाहिए। साथ ही, इस बात का भी ध्यान रखें कि सच्चे मित्र कौन हैं, क्योंकि सच्चे मित्रों की मदद लेने पर ही सफलता मिल सकती है। यदि गलती से मित्र बने हुए शत्रु से मदद मांग ली तो पूरी मेहनत पर पानी फिर सकता है।
तीसरी बात: यह देश कैसा है
यह देश कैसा है यानी जहां हम काम करते हैं, वह स्थान, शहर और वहां के हालात कैसे हैं। कार्यस्थल पर काम करने वाले लोग कैसे हैं। इन बातों का ध्यान रखते हुए काम करेंगे तो असफल होने की संभावनाएं बहुत कम हो जाएंगी।
चौथी बात: हमारी आय और व्यय की सही जानकारी
समझदार इंसान वही है तो अपनी आय और व्यय की सही जानकारी रखता है। व्यक्ति को अपनी आय देखकर ही व्यय करना चाहिए। जो लोग आय से अधिक खर्च करते हैं, वे परेशानियों में अवश्य फंसते हैं। अत: धन संबंधी सुख पाने के लिए कभी आय से अधिक व्यय नहीं करना चाहिए। आय से कम खर्च करेंगे तो थोड़ा-थोड़ा ही सही पर धन संचय हो सकता है।
पांचवीं बात: मैं किसके अधीन हूं
हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमारा प्रबंधक, कंपनी, संस्थान या बॉस हमसे क्या चाहता है। हम ठीक वैसे ही काम करें, जिससे संस्थान को लाभ मिलता है। यदि संस्थान को लाभ होगा तो कर्मचारी को भी लाभ मिलने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
अंतिम बात: मुझमें कितनी शक्ति है
अंतिम बात सबसे जरूरी है, हमें यह मालूम होना चाहिए कि हम क्या-क्या कर सकते हैं। वही काम हाथ में लेना चाहिए, जिसे पूरा करने का सामर्थ्य हमारे पास है। यदि शक्ति से अधिक काम हम हाथ में ले लेंगे तो असफल होना तय है। ऐसी परिस्थिति में कार्य स्थल और समाज में हमारी छबि पर बुरा असर होगा।
कौन हैं चाणक्य
प्राचीन समय में आचार्य चाणक्य तक्षशिला के गुरुकुल में अर्थशास्त्र के आचार्य थे। चाणक्य की राजनीति में गहरी पकड़ थी। इनके पिता का नाम आचार्य चणीक था, इसी वजह से इन्हें चणी पुत्र चाणक्य भी कहा जाता है। संभवत: पहली बार कूटनीति का प्रयोग आचार्य चाणक्य द्वारा ही किया गया था। जब इन्होंने अपनी कूटनीति के बल पर सम्राट सिकंदर को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया। इसके अतिरिक्त कूटनीति से ही इन्होंने चंद्रगुप्त जैसे सामान्य बालक को अखंड भारत का सम्राट भी बनाया। आचार्य चाणक्य द्वारा श्रेष्ठ जीवन के लिए चाणक्य नीति ग्रंथ रचा गया है। इसमें दी गई नीतियों का पालन करने पर जीवन में सफलताएं प्राप्त होती हैं।
सावन का महीना सनातम धर्म में काफ़ी महत्व रखता है. इस पूरे महीने लोग महादेव शिव जी की पूजा करते हैं. इस महीने के साथ कई तरह की कहानियां भी जुड़ी हैं. ग्रंथ और पुराणों में भी इसका वर्णन है.
एक कथा के अनुसार, ऋषि मुनी म्रिकंद और उनकी पत्नि मरुधमती पुत्र प्राति के लिए शिव की अराधना की. भगवान शिव प्रसन्न हो गए, लेकिन उन्होंने पुत्र देने के साथ एक शर्त भी रख दी और कहा कि उन्हें बुद्धिमान बालक चाहिए या मंदबुद्धि, अगर वो बुद्धिमान बालक चुनते हैं, तो उसकी उम्र बहुत कम होगी और वो कुमार अवस्था में ही मर जाएगा. अगर वो मंदबुद्धि का बालक होगा, तो लम्बी आयु पाएगा.
Source: peakingtree
पती-पत्नि बुद्धिमान बालक को चुनते हैं और जैसे ही वो थोड़ा बड़ा होता है उसे इस श्राप के बारे में बताते हैं. वो बच्चा इस श्राप से मुक्त होने के लिए घोर तपस्या करता है. इस दौरान कई यम दूत उसे अपने साथ लेने आते हैं, लेकिन उसकी तपस्या के प्रताप से कोई भी उसे छू नहीं पाता. अंत में हार के खुद उसकी आत्मा को लेने यमराज प्रकट होते हैं. यमराज अपने फ़ंदे से जैसे ही उस बालक को पकड़ना चाहते हैं, गलती से वो फ़ंदा शिवलिंग पर गिर जाता है. इससे शिव काफ़ी क्रोधित होते हैं और यमराज को वहां से चले जाने का आदेश देते हैं.
Source: speakingtree
उस बालक की तपस्या पूरे एक महीने चलती है और इसी महीने को आगे चल कर सावन का महीना कहा जाता है. ये बालक असीम बुद्धि का स्वामी बनता है. जिसे आज लोग मारकांद्य ऋषि के नाम से जानते हैं.
इस महीने में अगर सच्चे दिल से भगवान शिव की अराधना की जाए, तो जो भी मांगो भगवान वो देते हैं.
Source: indianastrology
लेकिन भगवान शिव को खुश करने के लिए इस महीने में कुछ चीज़ों का त्याग भी ज़रूरी है. सिर्फ़ मांस और शराब का ही नहीं, बल्कि इस महीने में बैंगन नहीं खाना चाहिए. इसका कारण धार्मिक के साथ-साथ वैज्ञानिक भी है. बरसात के महीने में बैंगन में कीड़े लग जाते हैं, जो कई बार दिखाई नहीं देते और हमारे शरीर को काफ़ी नुकसान पहुंचाते हैं.
Source: ayurvedcentral
वहीं दूसरी चीज़ है हरी सब्ज़ियां. बरसात के महीने में इन सब्ज़ियों में भी कीड़े लगे होते हैं और उन्हें बी खाना सेहत के लिए हानिकारक होता है.
Source: khoobsurati
सबसे ज़्यादा दूरी हमें दूध और उससे बने पदार्थों से रखनी चाहिए. इसका कारण भी धार्मिक से ज़्यादा वैज्ञानिक है. इस मौसम में हरी सब्ज़ियां ही ज़्यादातर दूध देने वाले जानवर खाते हैं, ऐसे में खराब और कीड़े लगी सब्ज़ियां खाने से उनका दूध भी ख़राब बनता है और इसे पीने से भी हम काफ़ी बीमार हो सकते हैं.
Source: massfarmtoschool
इन सब के त्याग से आपका शरीर स्वस्थ रहता है और आप भगवान शिव की तरफ़ बेहतर ध्यान लगा सकते हैं. इस लिए इन सब चीज़ों से दूरी बनाना ज़रूरी होता है.
गुरु द्रोणाचार्य, पाण्डवोँ और कौरवोँ के गुरु थे, उन्हेँ धनुर्विद्या का ज्ञान देते थे।
एक दिन एकलव्य जो कि एक गरीब शुद्र परिवार से थे. द्रोणाचार्य के पास गये और बोले कि गुरुदेव मुझे भी धनुर्विद्या का ज्ञान प्राप्त करना है
आपसे अनुरोध है कि मुझे भी आपका शिष्य बनाकर धनुर्विद्या का ज्ञान प्रदान करेँ।
किन्तु द्रोणाचार्य नेँ एकलव्य को अपनी विवशता बतायी और कहा कि वे किसी और गुरु से शिक्षा प्राप्त कर लें।
यह सुनकर एकलव्य वहाँ से चले गये।
इस घटना के बहुत दिनों बाद अर्जुन और द्रोणाचार्य शिकार के लिये जंगल की ओर गये। उनके साथ एक कुत्ता भी गया हुआ था।
कुत्ता अचानक से दौड़ते हुय एक जगह पर जाकर भौँकनेँ लगा, वह काफी देर तक भोंकता रहा और फिर अचानक ही भौँकना बँद कर दिया।
अर्जुन और गुरुदेव को यह कुछ अजीब लगा और वे उस स्थान की और बढ़ गए जहाँ से कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आ रही थी।
उन्होनेँ वहाँ जाकर जो देखा वो एक अविश्वसनीय घटना थी। किसी ने कुत्ते को बिना चोट पहुंचाए उसका मुँह तीरोँ के माध्यम से बंद कर दिया था और वह चाह कर भी नहीं भौंक सकता था।
ये देखकर द्रोणाचार्य चौँक गये और सोचनेँ लगे कि इतनी कुशलता से तीर चलाने का ज्ञान तो मैनेँ मेरे प्रिय शिष्य अर्जुन को भी नहीं दिया है और न ही ऐसे भेदनेँ वाला ज्ञान मेरे आलावा यहाँ कोई जानता है….
तो फिर ऐसी अविश्वसनीय घटना घटी कैसे?
तभी सामनेँ से एकलव्य अपनेँ हाथ मेँ तीर-कमान पकड़े आ रहा था।
ये देखकर तो गुरुदेव और भी चौँक गये।
द्रोणाचार्य नेँ एकलव्य से पुछा ,” बेटा तुमनेँ ये सब कैसे कर दिखाया।”
तब एकलव्य नेँ कहा , ” गुरूदेव मैनेँ यहाँ आपकी मूर्ती बनाई है और रोज इसकी वंदना करने के पश्चात मैं इसके समकक्ष कड़ा अभ्यास किया करता हूँ और इसी अभ्यास के चलते मैँ आज आपके सामनेँ धनुष पकड़नेँ के लायक बना हूँ।
गुरुदेव ने कहा , ” तुम धन्य हो !
तुम्हारे अभ्यास ने ही तुम्हेँ इतना श्रेष्ट धनुर्धर बनाया है और आज मैँ समझ गया कि अभ्यास ही सबसे बड़ा गुरू है।”