सीटीएई फार्म के पास स्थित प्राचीन सुंदर बाई की बावड़ी है शिल्पकारी का बेजोड़ नमूना
उदयपुर.
सुंदरवास के पास सीटीएई फॉर्म के बीच स्थित प्राचीन सुंदर बाई की बावड़ी शिल्पकारी का बेजोड़ नमूना है। बावड़ी के बगल में एक शिवालय भी है। 357 साल पूर्व बावड़ी और सुंदरेश्वर शिवालय का निर्माण एक साथ हुआ हुआ था। नियमित सार-संभाल होने के कारण मंदिर आज भी बेहतर हालात में है।
धरोहर प्रेमियों का कहना है कि पुरा महत्व को देखते हुए बावड़ी स्थल को संवारे जाने की आवश्यकता है। इन दिनों श्रावण का महीना होने के कारण यह स्थान लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ। शिवालय में सुबह से शाम तक दर्जनों श्रद्धालु आकर पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिर की सार-संभाल सालों से सीटीएई के फॉर्म के मैनेजर एमएम शर्मा नि:शुल्क कर रहे हैं। सुबह-शाम की आरती, मंदिर को खोलने और बंद करने का कार्य शर्मा ही करते हैं।
यह है बावड़ी का इतिहास
इतिहास डॉ. श्रीकृष्ण जूगनू और डॉ. जीएन माथुर के अनुसार महाराणा राज सिंह के समय विक्रम संवत 1717 (1660 ई.) में इस बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। यह अपने नाम के अनुरूप उत्कृष्ट स्थापत्य धरोहर है। छतरियों और खंभों पर की गई नक्काशी तत्कालीन शिल्प कौशल की उत्कृष्टता को दर्शाती है। बावड़ी की दीवारों देवी-देवताओं की दर्जनों मूर्तियां हैं, जो तत्कालीन मूर्तिकला का अनुपम उदाहरण हैं। बावड़ी के शिलालेख के अनुसार महाराजा राजसिंह ने सुंदरबाव बनवाने के उपलक्ष्य में गोविंद राम व्यास को भुवाणा गांव में 75 बीघा जमीन दी। वारातण लाली ब्रह्माणी ने एक सराय, मंदिर और बावड़ी का निर्माण करवाया।
सुंदरबाई की बावड़ी स्थापत्य कला का नायाब नमूना है। शहर की एकमात्र एेसी विशालकाय बावड़ी है जिसकी दीवारों पर विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं हैं। इसका निर्माण 1660 ईस्वी में हुआ।
डॉ. श्रीकृष्ण जूगनू, इतिहासकार
बावड़ी और मंदिर सीटीएई फॉर्म के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। जलस्रोत संरक्षण योजना के तहत जल्दी ही बावड़ी का जीर्णोद्वार कराया जाएगा।
प्रो. एसएस. राठौड़, डीन सीटीएई
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