New Delhi: आज से करीब 10 साल पहले राष्ट्रपति प्रतिभा पािटल ने जिस बच्चे को बहादुरी का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया था, वो आज पैसों की तंगी की वजह से जूते बनाने पर मजबूर है।
11 साल की उम्र में यमुना के तेज बहाव में दो युवकों की जान बचाने वाला शहंशाह आज जूता कारखाने में जूता बना रहा है। वीरता पुरस्कार मिलने के बाद शहंशास से कई वादे किए गए लेकिन 10 साल बाद भी सरकार के ये वादे पूरे नहीं हुए।
एत्माद्दौला यमुना ब्रिज की दलित बस्ती मे रेलवे ब्रिज के नीचे एक छोटी झोपड़ी में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाने वाला यह बहादुर बच्चा सिर्फ 2500 रुपए की तनख्वाह में काम कर रहा है। 2 सितंबर 2007 मे शहंशाह अपनी वीरता की वजह से सुर्खियों में आया था जब उसने यमुना मे डूबते हुए दो युवको को अपनी जान पर खेलकर बचाया था।
उसकी इस वीरता के लिए वर्ष 2009 मे गणतंत्र दिवस पर तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने उसे वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया था। इतना ही नहीं UPA चेयरमैन सोनिया गांधी, तत्कालीन रक्षामंत्री एके एंटनी, दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित समेत कई हस्तियों ने उसकी पीठ थपथपाई थी। शहंशाह बताते है कि राष्ट्रपति पुरस्कार मिलने के समय उसने अपनी पढ़ाई और सरकारी योजना मे एक मकान की इच्छा जताई थी। इसे पूरा करने का दिल्ली मे वादा भी किया गया था।
पुरस्कार मिलने के कुछ महीने बाद सरकारी खर्च पर उसकी पढ़ाई का इंतजाम तो हो गया। 2013 मे उन्होने इंटर पास कर लिया। इसके बाद उनको सरकारी मदद मिलना बंद हो गई। शहंशाह ने आगे पढ़ने के लिए लखनऊ से लेकर दिल्ली तक भागदौड़ की, लेकिन सबकुछ कागजों में सिमट कर रह गया। वर्ष 2014 मे अधिकारियों ने नई सरकार बनने की बात कहकर पल्ला झाड़ लिया। इंजीनियर बनने का सपना संजोए शहंशाह को घर के हालात खराब होने पर मजबूरन जूते की फैक्ट्री मे काम करना पड़ा।
शहंशाह ने बताया कि वो काला महल स्थित एक जूते की फैक्ट्री में जूतों पर सोल लगाने का काम करता है। पूरे महीने काम करने के बाद वो दो से ढाई हजार रुपये कमा पाते है। इसी पैसे से आज उसका पूरा परिवार चल रहा है। शहंशाह का कहना है कि पुरस्कार मिलने के समय उनसे मकान दिलाने का वादा किया गया था। तत्कालीन डीएम ने भी उन्हे आश्वासन दिया था।
शहंशाह ने बताया कि अधिकारियों और कर्मचारियों के रवैए से वो दुखी है। जब वो उन्हे बताते थे कि राष्ट्रपति ने उन्हें वीरता पुरस्कार दिया है तो कई कर्मचारी उन पर हंसते थे। उनसे यहां तक कहा गया कि हम क्या करें जो तुमने जान बचाई थी। कई बार वो राष्ट्रपति द्वारा दिए गया मेडल और प्रशस्ति पत्र भी लेकर गए तो उनसे कहा गया कि अपने पास रखो इसकी कोई वैल्यू नहीं है। शहंशाह की मां अनीसा को मकान न मिलने से ज्यादा मलाल अपने बेटे के मेडल और प्रशस्ति पत्र को टांगने के लिए घर मे जगह न होने का है। जब भी कोई उनके घर आता है तो वो एक टूटे से सूटकेस को लाती है। उससे धूल हटाकर बेटे को मिली बहादुरी की निशानी को दिखाती है।
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